आखिर क्या है मुहर्रम, जानिए इमाम हुसैन की मौत से कैसे हुई इस गम के महीने की शुरुआत…

मुहर्रम (Muharram) से इस्‍लाम धर्म के नए साल की शुरुआत होती है. यानी कि मुहर्रम का महीना इस्‍लामी साल का पहला महीना होता है. इसे हिजरी भी कहा जाता है. हिजरी सन् की शुरुआत इसी महीने से होती है. इस्लाम के चार पवित्र महीनों में इस महीने को भी शामिल किया जाता है. मुहर्रम मातम मनाने और धर्म की रक्षा करने वाले हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद करने का दिन है. मुहर्रम के महीने में मुसलमान शोक मनाते हैं और अपनी हर खुशी का त्‍याग कर देते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों किया जाता है..? आइए जानते हैं…

इस्‍लामी मान्‍यताओं के मुताबिक करबला में 680 ईस्वी में शिया और सुन्नी संप्रदायों के बीच एक लड़ाई हुई थी. जिसे ‘करबला की लड़ाई’ कहा जाता है. ये लड़ाई पैगंबर मोहम्मद के नवासे यानी नाती इमाम हुसैन और तब मुसलमानों के प्रमुख खलीफा उम्मय्या वंश के यजीद के समर्थकों के बीच हुई थी. इराक में यजीद नाम का जालिम बादशाह इंसानियत का दुश्मन था. यजीद खुद को खलीफा मानता था, लेकिन अल्‍लाह पर उसका कोई विश्‍वास नहीं था. वह चाहता था कि हजरत इमाम हुसैन उसके खेमे में शामिल हो जाएं. लेकिन हुसैन को यह मंजूर नहीं था. इमाम हुसैन अली के बेटे थे और अली की शादी पैगंबर मोहम्मद की बेटी फातिमा से हुई थी

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उम्मय्या वंश के लोगों ने पैगंबर मोहम्मद की मौत के बाद राजनीतिक सत्ता हासिल करने की कोशिश की. इसी वंश के मुवैय्या ने खलीफा अली को धोखे से मारकर राजनीतिक सत्ता हासिल कर ली और फिर अपने बेटे यजीद को अपना उत्तराधिकारी बना दिया. यजीद ने अपने पिता मुवैय्या की मौत के बाद खुद को खलीफा घोषित कर दिया और वे चाहते थे कि हुसैन उनकी खिलाफत को स्वीकार करें.

मगर हुसैन ने इसे इस्लाम के सिद्धांत के विपरीत बताते हुए यजीद का नेतृत्व स्वीकार करने से मना कर दिया. जिसके बाद करबला की लड़ाई हुई. इस लड़ाई में पैगंबर-ए इस्‍लाम हजरत मोहम्‍मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन को कर्बला में परिवार और दोस्तों के साथ शहीद कर दिया गया था. जिस महीने हुसैन और उनके परिवार को शहीद किया गया था वह मुहर्रम का ही महीना था. उस दिन 10 तारीख थी. मुहर्रम महीने के 10वें दिन को आशुरा कहते हैं. इस घटना के बाद इस्‍लाम धर्म के लोगों ने इस्लामी कैलेंडर का नया साल मनाना छोड़ दिया. बाद में मुहर्रम का महीना गम और दुख के महीने में बदल गया. तब से शिया समुदाय के लोग 10 मुहर्रम के दिन काले कपड़े पहनकर हुसैन और उनके परिवार की शहादत को याद करते हैं

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