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तालिबान और चाइना भारत के लिए खतरा GG

by GwriterBSP

जिस शर्मनाक तरीके से अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकला है उस पर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा की कभी भी अमेरिकी सेना किसी देश से इतनी बुरी तरह बेइज्जत होकर नहीं निकली है, ट्रंप ने कहा कि यह विफलता बाइडेन प्रशासन की अक्षमता है।


लेकिन अमेरिका के जाने के बाद चीन की टेढी नजर अफ़ग़ानिस्तान पर पड़ चुकी है, जहां आतंकी तालिबान और पाकिस्तान एक तरह से कहे चाइना के हाथ की कठपुतली बन कर रहे गए है। वहीं चाइना आतंकी तालिबान का इस्तेमाल कर भारत की मध्य एशिया तक पहुंच को खत्म करना चाहता है। चीन अपनी गंदी आर्थिक नीतियों को बढ़ावा देने के लिए आतंकी तालिबान और पाकिस्तान को कठपुतली बनाकर भारत की विदेश नीति सीमा सुरक्षा को नुकसान पहुंचाना चाहता है।
और यही नहीं चाइना तालिबान के दुर्लभ पृथ्वी सामग्री का उपयोग कर पुरे विश्व में एकाधिकार जमाना चाहता है। भारत में उभरती हुई इलैक्ट्रिक वाहन की मार्केट को चीन आतंकी तालिबान के सहारे, अफ़ग़ानिस्तान के संसाधनों का प्रयोग करके भारत की उभरती हुई मार्केट को उखाड़ फेकना चाहता है।
आतंकी तालिबान चीन की उंगलियों पर नाचता है इसका प्रमाण इसी से ही मिलता है कि आतंकी तालिबान ने ऊईघुर मुसलमानों के मामले को चीन का आंतरिक मुद्दा बताया है।

pakistan, taliban and china flags in shield. stock illustration.


वहीं चीन, पकिस्तान और तालिबान और ईरान के सहारे भारत की मध्य एशिया तक पहुंच की नीति को पूरी तरीके से नष्ट करना चाहता है। जहां पाकिस्तान चाइना के टुकड़ों पर पल रहा है वहीं तालिबान का का भी कुछ यहीं आलम है।
चीन तालिबान के सहारे मध्य एशिया यूरोप तक अपनी पहुंच बनाना चाहता है वहीं कुछ रणनीतिकारों का यह भी मानना है कि चीन अपनी गंदी भू राजनीतिक करके भारत द्वारा बनाए गए चाहबार पोर्ट का इस्तेमाल अपनी फरास की खाड़ी तक पहुंच के लिए करना चाहता है। वहीं कुछ रणनीतिकारों का मानना यह भी है कि चीन चाबहार पर कब्ज़ा करने और उसे चीन से जोड़ने के लिए अफ़ग़ानिस्तान के बावजूद एक गलियारे के साथ एक अच्छी स्थिति में है।
वहीं चीन वन बेल्ट वन रोड परियोजना के तहत आतंकी तालिबान को परियोजना से जोड़ना चाहता है। क्योंकि वर्तमान में भारत द्वारा अफ़ग़ानिस्तान में किया गया निवेश अब पूरी तरह से आतंकी तालिबान के कब्जे में है ऐसे में अफ़ग़ानिस्तान में भारत द्वारा किया गया निवेश का इस्तेमाल चीन अपने फायदे के लिए करना चाहता है।
जहां अमेरिका से दुश्मनी के कारण ईरान अभी बहुत बुरी आर्थिक तंगी से गुजर रहा है वहीं चीन ने ईरान के साथ 400 बिलियन डॉलर की डील कर पिछले 2 वर्षों में ईरान को अपने एहसान तले दबा दिया है जिस कारण अब चाइना जो चाहे वो निर्माण ईरान में कर सकता है।
चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के समानांतर एक अफगान- शिनजियांग प्रांत के काशगर से फारस की खाड़ी में ग्वादर के पाकिस्तानी बंदरगाह तक कारखानों, बिजली संयंत्रों और पाइपलाइनों का 50 अरब डॉलर का विकास-कार्ड पर एक बड़ा खेल खेलने के लिए तैयार है। जो भारत के मध्य एशिया तक पहुंच के लिए एक समस्या है।

वहीं चीन, आतंकी तालिबान और चीन के टुकड़ों पर पलने वाला पाकिस्तान की मदद से भारत को सीमा सुरक्षा पर लगातार परेशान करना चाहता है।
अमेरिका को गीदड़ की तरह भागता देख चाइना को तालिबान में एक अवसर दिखने लगा है, और यही नहीं तालिबान के हाथ लगे अमेरिकी आधुनिक हथियारों को देख चाइना को भारत के रक्षा और हेलीकॉप्टर और आदि हथियारों को जानने और उसकी नकल करके बनाने का एक बड़ा मौका मिला है और नकल करके हथियारों को बनाने में चाइना माहिर है और कई बार रूस अमेरिका ने चीन पर तकनीक चोरी का इल्ज़ाम लगाया है।
तालिबान द्वारा हथियाये गए हथियारों के मॉडल तकनीक को समझ कर चोर चीन भारत के हेलीकॉप्टर आदि हथियारों के बारे में जानकारी इकट्ठा कर सकता है जिस कारण चोर चीन एल ए सी पर , भारत के हथियारों को देख कर समझ कर, उसी हिसाब से अपने हथियार सीमा पर तैनात कर सकता है।


वर्तमान में कहे तो चीन, भारत की व्यापारिक, आर्थिक राजनीतिक, सीमा सुरक्षा और विदेश नीति आदि सभी को नष्ट करना चाहता है और आतंकी तालिबान और पाकिस्तान को अपने इस खेल का मोहरा बना रहा है।

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