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बिहार में दहशत, चंद्रयान-2 के कारण गिरा उल्का पिंड?

बिहार में मधुबनी जिले के लौकही के महादेवा गांव में आसमान से गिरे उल्का पिंड का वजन करीब 13 किलोग्राम है. इस रहस्यमयी पत्थर को लेकर कई तरह की बातें भी सामने आई है. पता चला है कि ये रहस्यमयी पत्थर एक उल्कापिंड है और इसमें चुंबकीय गुण भी मौजूद है.

भारत ने हाल ही में चांद पर खोज के लिए चंद्रयान-2 का सफल प्रक्षेपण किया है. लेकिन उसके बाद भारत में एक ऐसी घटना हुई, जिसे देखकर हर कोई हैरान रह गया. दोस्तों, चंद्रयान-2 लॉन्च करने के कुछ ही दिनों बाद बिहार के मधुबनी जिले में उस वक्त हड़कंप मच गया जब आसमान में गड़गड़ाहट की आवाज के साथ जलता हुआ पत्‍थर खेत में आ गिरा. जी हां, दोस्तों, आसमान से गिरे इस पत्थर की आवाज से और इस पत्थर को देखकर आसपास के लोग बुरी तरह से डर गए. चारों तरफ धुआं ही धुआं हो गया. खेत में काम कर रहे किसान डरकर इधर-उधर भागने लगे. वहां के लोग इस पत्थर के कारण पूरी तरह से दहशत में आ गए थे. फिर थोड़ी देर बाद जब धुआं हटा तो किसान वापस अपने खेतों की तरफ लौटे. उस पत्थर के पास जाकर देखा तो चार फीट गहरा गढ्डा हो गया था. उसमें बड़ी बॉल के आकार का पत्‍थर पड़ा था. ये पत्थर काफी वह काफी गर्म था और लोग इसे छूने से भी कांप रहे थे. लेकिन इसके ठंडा होने पर लोगों ने इसे बाहर निकाला. इसके बाद यह खबर आग की तरह फैली और सूचना पाकर प्रशासन मौके पर पहुंचा. इसके बाद समझ आया कि जिसे ग्रामीण पत्‍थर समझ रहे थे वह असल में एक उल्का पिंड था. लेकिन दोस्तों, अब सवाल उठता है कि क्या इस उल्का पिंड का चंद्रयान-2 से कोई संबंध है? क्या आसमान में चंद्रयान-2 का लॉन्च करने के कारण ये पत्थर जमीन पर गिरा है? आइए जानते हैं लेकिन दोस्तों, उससे पहले अगर आपने अभी तक हमारे चैनल को सब्सक्राइब नहीं किया है तो नए अपडेट्स पाने के लिए जल्द से जल्द सब्सक्राइब कर लें. आइए शुरू करते हैं....

दोस्तों, बिहार में मधुबनी जिले के लौकही के महादेवा गांव में आसमान से गिरे उल्का पिंड का वजन करीब 13 किलोग्राम है. इस रहस्यमयी पत्थर को लेकर कई तरह की बातें भी सामने आई है. पता चला है कि ये रहस्यमयी पत्थर एक उल्कापिंड है और इसमें चुंबकीय गुण भी मौजूद है. यह पत्थर लोहे को यह अपनी ओर आकर्षित करता है. इसके बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने भी इस उल्का पिंड को ले जाया गया. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस पत्थर को देखने के बाद कहा कि इसे बिहार संग्रहालय में रखा जाएगा, जिससे आम लोग भी इसे देख सकेंगे. इसके बाद इसे विज्ञान संग्रहालय हस्तांतरित कर दिया जाएगा. सीएम नीतीश ने पत्थर को देखने के बाद कहा कि इस पत्थर की जांच कराई जाएगी. लोग इसे संभावित उल्का पिंड बता रहे हैं, जिसमें चुंबकीय शक्ति है. मधुबनी के जिलाधिकारी शीर्षत कपिल ने भी इस पत्थर को उल्का पिंड होने की संभावना जताई है. मुख्यमंत्री ने पत्थर के अध्ययन कराने का निर्देश अधिकारियों को दिया

वहीं गांव के लोगों का दावा है कि यह आसमान से गिरा है. जब यह पत्थर गिरा था तब बहुत तेज आवाज हुई थी. हालांकि इसके बाद कुछ लोगों ने उस पत्थर को पास के ही एक पीपल के पेड़ के नीचे रखकर पूजा अर्चना शुरू कर दी थी. बाद में पुलिस ने इसे जब्त कर लिया. गांव के लोगों के मुताबिक जिस खेत से पत्थर को निकाला गया, वहां करीब 4 फीट गहरा गड्ढा बन गया है. 

हालांकि दोस्तों, ये पहला मौका नहीं है जब बिहार में उल्का पिंड गिरा हो. इससे पहले भी बिहार में उल्का पिंड गिरने की घटना सामने आ चुकी है. इससे पहले दो बार और बिहार में उल्का पिंड गिर चुका है. पहला उल्का पिंड 23 मई 1950 को 3 बजे दिन में मधेपुरा शहर में एक गोदाम पर तेज आवाज के साथ छत को फाड़ता हुआ धरती पर गिरा था, इसकी आवाज से इलाके में दहशत मच गयी थी. एक अंजान सा डर लोगों के मन में घर कर गया था. इस उल्का पिंड को जांच परख के बाद पटना संग्रहालय को सौंप दिया गया था.

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दूसरी बार 11 अप्रैल 1964 को 5 बजे एक ही समय में दो जगहों पर उल्का पिंड गिरे थे. पहला गंडक नदी के पूरब मुजफ्फरपुर जिले के पारु थाना में रेवाघाट के नजदीक एक खेत में और दूसरा गंडक के पश्चिम, सारण जिले के परसा थाना में एक गांव के पास खेत में उल्का पिंड गिरा था. दोनों उल्का पिंडों को संयुक्त रूप से मुजफ्फरपुर उल्का पिंड या मुजफ्फरपुर मिटियोराइट के नाम से जाना जाता है. इन पिंडों को भी जांच के बाद पटना संग्रहालय को सौंप दिया गया था. इसके बाद अब तीसरी बार 22 जुलाई 2019 को मधुबनी जिले में उल्का पिंड गिरा है.

हालांकि दोस्तों, इस उल्का पिंड का चंद्रयान-2 से कोई संबंध है या नहीं इस पर प्रशासन ने किसी प्रकार की टिप्पणी नहीं की है. वैसे दोस्तों, उल्का पिंडों का टूटना एक सामान्य घटना के तौर पर देखा जाता है. दोस्तों, ब्रह्मांड में अरबों की संख्या में उल्का पिंड मौजूद हैं. उल्का पिंड के टुकड़े होते हैं और यह स्वतंत्र अवस्था में ब्रह्मांड में घूमते रहते हैं. उल्कापिंड ब्रह्मांड में करोड़ों - अरबों की संख्या में मौजूद होते हैं और यह घूमते-घूमते कभी-कभी पृथ्वी की गुरुत्वकार्षण शक्ति के कारण पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर जाते हैं और तेजी से धरती पर गिरने लगते हैं.

दोस्तों, आम तौर पर  वायुमंडलीय घर्षण से उल्का पिंड आसमान में ही जलकर राख हो जाते हैं. कभी-कभी ये बड़े आकार में पृथ्वी पर गिरने के वक्त पूरी तरीके से जल नहीं पाते. इसी कारण बचा हुआ हिस्सा धरती पर बहुत तेज गति से गिर जाता है. गिरते वक्त ये उल्का पिंड काफी गरम भी होता है.

दोस्तों, अगर आसान शब्दों में कहें तो हम इंसानो की अधूरी ख्वाहिशो को पूरा करने वाला, आसमान का वो सितारा जिसे हम 'टूटते हुए तारे ' के रूप में जानते है, वही उल्का पिंड होता है. इसी उल्का का जो भाग या पूरा उल्का पृथ्वी के वायुमंडल के घर्षण से न जलकर, हमारी धरती पर गिरता है उसे हम उल्का पिंड का नाम देते हैं. अगर ये पिण्ड अंतरिक्ष मे विचरण करते हुए हमारी धरती के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में प्रवेश करते है तो धरती पर आ गिरते है.