Home Facts नेहरू से मोदी तक, चीन को लेकर भारत ने की ये बड़ी गलतियां

नेहरू से मोदी तक, चीन को लेकर भारत ने की ये बड़ी गलतियां

by Gwriter

गलवान घाटी में चीन द्वारा किए गए हमले में 20 भारतीय सैनिकों के शहीद होने के बाद भारत और चीन के राजनीतिक, इकॉनोमिक और भौगोलिक समझौते पर सवाल उठ रहे हैं. भारत और चाइना के बीच हुई लड़ाइयों में भारत ही समझौता करता आया है. भारतीय राजनेताओं ने हमेशा से चाइना को शांत रहने और खुद के विकास पर फोकस करने की पॉलिसी को अपनाया हुआ है. जिसका चाइना ने हमेशा गलत फायदा उठाया है. भारत द्वारा कई बार ऐसी गलतियां की गई हैं. जब भारत के समझौता से चाइना का फायदा हुआ और उसके हौसले बुलंद हो गए. 1951 में जब चाइना ने तिब्बत पर अटैक करके उसे अपना हिस्सा बना लिया था, तब से और अभी तक चाइना के खिलाफ भारत का बड़ा शांत रवैया रहा है. जब चीन ने तिब्बत पर कब्जा करके उसे ऑटोनोमस पार्ट ऑफ चाइना बनाया तब भी भारत ने तिब्बत की मदद न करके चाइना की इस बात का समर्थन किया, जिससे वह शांत रहे और हमारे देश पर हमला न करें. उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चाइना की तिब्बत वाली बात का समर्थन किया और अपने देश के विकास पर फोकस किया. हालांकि उस समय हमारा देश हथियारों और सैनिकों सहित अन्य चीजों को लेकर काफी युवा श्रेणी में था, जिससे हमें शांत रहना पड़ा. उस समय चाइना को फायदा हुआ और वह कुछ समय के लिए शांत हो गया.

साल 1962 में चाइना ने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश के बार्डर पर हमला किया था. उस समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से दो गलतियां हुई. पहली यह कि भारत ने चाइना के हवाई हमले के डर से अपनी भारतीय वायुसेना का इस्तेमाल नहीं किया, पूरी लड़ाई भारतीय थल सेना ने लड़ी. नतीजन हम हार गए. दरअसल, हमारी इंटेलीजेंस एजेंसियों को यह जानकारी मिली थी कि चाइना हमारे हवाई हमले के जवाब में हवाई हमला कर सकता हैं, साथ ही वह कहां से और किन हिस्सों में हवाई हमला करेगा, इसकी भी कोई पुख्ता जानकारी नहीं थी. जिसके चलते हमें उसे शांत करने के लिए समझौता करना पड़ा. दूसरी गलती, अमेरीका द्वारा भारत को हमले से पहले उनके साथ शामिल होने के ऑफर को जवाहरलाल नेहरू ने ठुकरा दिया था. जिससे हमें उस समय न्यूक्लियर हथियार नहीं मिला और चाइना ने 1962 में बिना किसी डर के भारत पर हमला कर दिया. इसके बाद 2003 में जब पीएम अटल बिहारी बाजपेयी ने चाइना का दौरा किया और कुछ आर्थिक और भौगोलिक मुद्दों पर समझौते हुए. उस समय भारत ने ऑफिशियल तौर पर तिब्बत को चाइना का हिस्सा मान लिया. इससे चाइना को आर्थिक तौर पर फायदा मिल गया. अगर अब चाइना को किसी बैंक से लोन चाहिए तो वह तिब्बत को अपना हिस्सा बताकर आसानी से लोन ले सकता था. यह भी हमने चाइना को शांत रखने के लिए किया.

इसके बाद भी 2015 से 2020 में पीएम नरेंद्र मोदी के समय में भी भारत ने चाइना को शांत रखने के लिए चाइना के वुहान में और तमिलनाडू में चाइना के साथ समिट में हिस्सा लिया. दोनों देशों के बीच फिर से कुछ समझौते हुए. लेकिन 15 जून 2020 की रात को चाइना ने फिर से गलवान घाटी में हमारे देश पर हमला कर दिया. जिससे साफ पता चलता है कि चाइना समझौते से नहीं मानने वाला है. उससे निपटने के लिए कड़े कदम उठाने पड़ेंगे. वहीं पीएम मोदी के दौर में चाइना के ऊपर लगाम लगाने के लिए चाइनीज एप को देश में बंद करने और कई आर्थिक समझौतों को रद्द करने का फैसला लिया गया.

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