नहीं होगा किसी को भी यकीन, हनुमान जी खुद योगी को अपनी जाति बता कर गए थे?

एक पुराना भजन है, दुनिया चले न श्री राम के बिना, राम जी चले न हनुमान के बिना. भक्ति साहित्य में राम नाम हनुमान के बिना न चलता हो मगर राजनीति की बिसात पर बरसों से जय श्री राम के नारों के बीच पवनपुत्र हनुमान की बात नहीं होती थी. अब जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हनुमान जी को वनवासी, आदिवासी और दलित बताया तो एक नई बहस शुरू हो गई है.

राजस्थान विधानसभा चुनाव के कैंपेन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जात-पात की राजनीति पर जमकर हमला बोला. पीएम के हमलावर तेवर जारी थे कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी एक गोला दाग दिया. यह गोला कहीं और नहीं बल्कि उन्हीं की पार्टी बीजेपी के पाले में आकर गिरा. हिंदुत्व के पोस्टर बॉय योगी आदित्यनाथ ना जाने कहां से हनुमान जी की जाति ढूंढ लाए. इंसानों से होती हुई जाति जब देवताओं के दरवाजे तक जा पहुंची तो एक बार फिर एहसास हुआ कि भारत के चुनाव से ज्यादा मनोरंजक इस दुनिया में कोई और इवेंट नहीं है. योगी आदित्यनाथ ने राजस्थान की एक जनसभा में कहा कि हनुमान जी दलित थे और जंगलों में रहते थे. लेकिन अब सवाल ये है कि क्या वाकई हनुमान जी दलित जाती के थे? सवाल जितना बड़ा है जवाब उतना ही छोटा है. दरअसल, किसी भी ग्रंथ में हनुमान जी की जाति का जिक्र मुश्किल से ही मिलता है. तो फिर हनुमान जी की जाति बताने के पीछे की मंशा क्या हो सकती है वो भी हम बता देते हैं.

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दरअसल, साल 2014 के लोकसभा चुनाव में कई चीजों के अलावा सबसे बुनियादी अंतर यह था कि पिछली बार विकास आगे था और हिंदुत्व बहुत पीछे. लेकिन इस बार हिंदुत्व सबसे आगे है. यह साफ हो चुका है कि 2019 का लोकसभा चुनाव बीजेपी राम मंदिर को केंद्र में रखकर लड़ेगी. योगी आदित्यनाथ का मुख्य काम राम के नाम पर हिंदू वोटरों को लामबंद करने का है. उन्हें न सिर्फ यूपी में हिंदू लहर पैदा करना है बल्कि यूपी से बाहर भी अपनी हिंदू हार्डलाइनर वाली इमेज को भुनाकर चुनावी सभाओं में भीड़ बटोरनी है.

हनुमान के बिना त्रेता में न तो भगवान राम चल सकते थे और न ही कलयुग में राम नामधारी कोई नेता चल सकता है. पिछड़ी और दलित जातियों को साथ लिए बिना बीजेपी के लिए वैसी हवा बनाना मुमकिन नहीं है, जैसी 1989 या 1992 में बनी थी. हनुमान की जाति बताने के पीछे आदित्यनाथ की मंशा उन दलितों में आत्मगौरव का भाव भरना है, जो मंदिर के नाम पर 2019 में बीजेपी के साथ खड़े हो सकते हैं.

साफ है कि अगर धार्मिक गोलबंदी कमजोर हुई तो जातिगत ध्रुवीकरण बढ़ेगा. उत्तर प्रदेश की तीन लोकसभा सीटों के लिए हुए उपचुनाव में यह ट्रेंड देखने को मिला. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के हाथ मिलाते ही बीजेपी के पुराने किले ढह गए. गोरखपुर की जिस सीट पर बीजेपी 30 साल से अजेय थी, वहां उसे हार का सामना करना पड़ा. ऐसे में अब बीजेपी 2019 में कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहेगी. इसलिए हो सकता है कि देश में जातियों को लुभाने के लिए आने वाले दिनों में नेताओं के जरिए एजेंडे के तहत और भी जाति बम फोड़े जा सकते हैं.

दरअसल, आस्था के बाजारीकरण में ऐसा ही होता है. देखते ही देखते भक्त शब्द का मतलब बदल गया. अच्छे दिन, पप्पू जैसे तमाम शब्द हद से ज्यादा नकारात्मक हो गए. रंगों को पाले में बांट दिया गया. ऐसे में आदर्श भक्त बजरंगबली का राजनीति में आना देर सबेर नियती बन गया था. आगे क्या होगा पता नहीं. ये चीजे कहां जाकर रुकेंगी पता नहीं, तब तक जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए…..

दोस्तों, कमेंट बॉक्स में कमेंट कर जरूर बताएं कि हनुमान जी किस भगवान की सेवा करते थे?

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