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छठ पूजा से जुड़ी कुछ रोचक बातें

छठ पूजा कार्तिक महीने में शुरू होने वाला एक प्रशिद्ध व धूमधाम से मनाया जाने वाला त्योहार हैं। विशेष रूप से छठ पूजा को बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश राज्यों में मनाया जाता है। लेकिन अब इसकी रौनक देश के अन्य राज्यों में भी देखने को मिलती है। तो आज हम इसी विषय पर आप लोगों से जानकारी सांझा करने जा रहें है और साथ ही इससे जुड़े कुछ रोचक तथ्य भी आपके सामने पेश करेंगे।

छठ पूजा का नाम सुनते ही हमें याद आता है कार्तिक महीने में शुरू होने वाला एक प्रशिद्ध व धूमधाम से मनाया जाने वाला त्योहार। विशेष रूप से छठ पूजा को बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश राज्यों में मनाया जाता है। लेकिन अब इसकी रौनक देश के अन्य राज्यों में भी देखने को मिलती है। तो आज हम इसी विषय पर आप लोगों से जानकारी सांझा करने जा रहें है और साथ ही इससे जुड़े कुछ रोचक तथ्य भी आपके सामने पेश करेंगे। 

छठ पूजा जोकि कार्तिक महीने की षष्ठी तिथि से शुरु होती है और सप्तमी यानि चार दिन तक लोग इस उत्सव को मनाते है। सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे 'छठ' भी कहा जाता है। केवल यही एक ऐसा पर्व है जिसमें लोग उदयाचल सूर्य यानि उगते हुए सूर्य की पूजा के अलावा अस्ताचलगामी सूर्य यानि डूबते हुए सूर्य की भी पूजा करते है। दोस्तों, एक मान्यता के अनुसार इस दिन मां गायत्री का जन्म हुआ था। साथ ही इस दिन सूर्यदेव की पूजा करने से व्यक्ति को सुख- स्मृधि मिलती है। एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ देवी को सूर्य देव की बहन माना गया हैं। तो इस हिसाब से भी सूर्य देव की उपासना करना लाभकारी माना गया है।

छठ पूजा के चार दिन के इस पर्व में व्रती सी नदी या तालाब में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता है। बता दें कि इस उत्सव की शुरुवात 'नहाय-खाय' से होती है। इस पहले दिन व्रती स्नान करने के बाद अरवा चावल, चना दाल और कद्दू की सब्जी का भोजन लेता हैं। दूसरे दिन वो पूरे दिन उपवास कर शाम में रोटी और गुड़ से बनी खीर का प्रसाद खाता हैं। तीसरे दिन व्रती पूरे दिन निर्जला व्रत रखता है और शाम को पूजा की तैयारी के लिए बांस से बनी टोकरी में ठेकुआ, फल, ईख समेत अन्य प्रसाद लेकर नदी, तालाब, या किसी अन्य जलाश में जाकर अस्ताचलगामी सूर्य यानि डूबते हुए सूर्य को अघ्र्य देता है। चौथे दिन यानी सप्तमी वाले दिन व्रती सुबह उगते हुए सूर्य की पूजा करता है। सूर्य को अघ्र्य देकर इस दिन वो अपना व्रत सम्पन्न करता है। व्रत पूर्ण होने के बाद वो वहां मौजूद लोगों को प्रसाद भी देता है। यही पूजा का विधान है।

विधान के अलावा हम आपको छठ पूजा से जुड़ी एक कहानी सुनाते है, जोकि महाभारत काल से जुड़ी है। दरअसल, जब पांडव अपना पूरा राजपाट हार चुके थे, तो ऐसे में उनकी पत्नी द्रौपदी ने भी इन 4 दिनों व्रत रखकर अपना राजपाट वापस मांगा था। द्रौपदी ने बकायदा सूर्य देव की पूजा की थी।

द्रौपदी ही नहीं एक दूसरी कथा के अनुसार इसका संबंध माता सीता से भी है। उन्होंने भी सूर्य देव की पूजा करके उनकी कृपा पाई थी। इस कथा के अनुसार रावण वध के बाद ऋषि-मुनियों के आदेश पर भगवान को राजसूय यज्ञ करना था, ताकि युद्ध के बाद पाप से मुक्त मिल सके। भगवान राम की तरफ से इस काम के लिए मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया गया, पर वो खुद आने की बजाए उन्होंने श्री राम और माता सीता को अपने आश्रम में बुलाया। मुग्दल ऋषि के आदेश पर श्री राम और माता सीता उनके आश्रम गए। जहां उन्हें इस पूजा के बारे में जानकारी दी गई। मुग्दल ऋषि द्वारा ही माता सीता को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का विचार मिला। तो दोस्तों, इन कहानियों को जानकार अब आपको भी पता चल गया होगा कि आखिर इस पर्व का इतना महत्व क्यूँ है।

 

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