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अनुच्छेद 370: अमित शाह ने इस बड़े कारण से लद्दाख को कश्मीर से अलग किया?

व्यापक विस्तार और बौद्ध आबादी होने के बावजूद लद्दाख को कभी भी जम्मू-कश्मीर को लेकर होनी वाली चर्चा में हिस्सा नहीं माना गया. कारगिल की मुस्लिम आबादी बढ़ने के साथ ही यहां की जनसांख्यिकी में भी बदलाव हो गए.

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन और अनुच्छेद 370 को हटाने से संबंधित संकल्प को पारित करा लिया. इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर को संविधान की ओर से दिए गए विशेष राज्य के दर्जे को वापस ले लिया गया. दरअसल, अनुच्छेद 370 का उद्देश्य जम्मू और कश्मीर की अलग पहचान को संरक्षित करना था, लेकिन अब इस अनुच्छेद को हटा लिया गया है और राज्य को दो भागों में बांट दिया गया है. अब जम्मू कश्मीर के अलावा लद्दाख नाम से दो केंद्र शासित प्रदेश बना दिए गए हैं. लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा देने का फैसला इस बौद्ध इलाके के लिए एक बड़ा तोहफा है जो लंबे समय से अलग-थलग था और कश्‍मीर के शोर में यहां की राजनीतिक आवाज दबी हुई थी. अब लद्दाख को अलग से केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा तो दे दिया गया है, लेकिन यहां विधानसभा नहीं होगी. केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने अपने बयान में कहा कि वहां के लोग काफी लंबे समय से इसे अलग केंद्र शासित प्रदेश के रूप में मान्यता दिए जाने की मांग कर रहे थे. इस मांग के पीछे तर्क यह था कि यहां के लोग अपने लक्ष्यों को हासिल करने में असमर्थ थे लेकिन अब लोग अपने लक्ष्यों को पाने के लिए आगे आ सकेंगे. लेकिन दोस्तों, क्या आप जानते हैं कि लद्दाख इतना खास क्यों हैं और इसका इतिहास क्या है? आइए जानते हैं....

दोस्तों, व्यापक विस्तार और बौद्ध आबादी होने के बावजूद लद्दाख को कभी भी जम्मू-कश्मीर को लेकर होनी वाली चर्चा में हिस्सा नहीं माना गया. कारगिल की मुस्लिम आबादी बढ़ने के साथ ही यहां की जनसांख्यिकी में भी बदलाव हो गए. इस बदलाव के बाद अब एक लोकसभा सीट के लिए बौद्ध अपना प्रतिनिधि चुनेंगे और यह सीट अब नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी लिए असुरक्षित हो गई है. वहीं रिमोट एरिया में रहने वाले मूलभूत सुविधाओं से वंचित लद्दाख के लोगों को घाटी या जम्मू से आए अधिकारियों की उदासीनता से जूझना पड़ता था. ये अधिकारी यहां पर तैनाती नहीं चाहते थे. अधिकारियों को यहां तैनाती दी जाती थी तो वे इस पोस्टिंग को सजा के रूप में देखते थे.

लद्दाख और जम्मू के लोगों ने हमेशा महसूस किया था कि पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व वाली श्रीनगर में बैठी सरकार उनके प्रति हमेशा उपेक्षा का रवैया अपनाती थी. यहां के लोगों ने इन सरकारों को हमेशा से लद्दाख के लिए सजा के रूप में देखा था. राजनीति के लिए मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्र से सीएम बनाया गया. घाटी से हिंदुओं के पलायन के बाद से ही घाटी-जम्मू की दरार तेज हो गई है.

दोस्तों, लद्दाख एक ऊंचा पठार है जिसका अधिकतर हिस्सा 3,500 मीटर यानी 9,800 फीट से ऊंचा है. यह हिमालय और काराकोरम पर्वत श्रृंखला और सिंधु नदी की ऊपरी घाटी में फैला है. करीब 33,554 वर्गमील में फैले लद्दाख में बसने लायक जगह बेहद कम है. यहां हर ओर ऊंचे-ऊंचे विशालकाय पथरीले पहाड़ और मैदान हैं. ऐसा माना जाता है कि लद्दाख मूल रूप से किसी बड़ी झील का एक डूबता हिस्सा था, जो कई सालों के भौगोलिक परिवर्तन के कारण लद्दाख की घाटी बन गया. 18वीं शताब्दी में लद्दाख और बाल्टिस्तान को जम्मू और कश्मीर के क्षेत्र में शामिल किया गया. लद्दाख के पूर्वी हिस्से में लेह के आसपास रहने वाले निवासी मुख्यतः तिब्बती, बौद्ध और भारतीय हिंदू हैं. लेकिन पश्चिम में कारगिल के आसपास जनसंख्या मुख्यत: भारतीय शिया मुस्लिमों की है. तिब्बत पर कब्जे के दौरान बहुत से तिब्बती यहां आकर बस गए थे.

दोस्तों, मोदी सरकार के अनुच्छेद 370 हटाने से आप सहमत हैं या नहीं, हमें कमेंट बॉक्स में कमेंट कर जरूर बताएं.

दोस्तों, जम्मू-कश्मीर मुख्यतः पांच भागों में विभाजित था. इनमें जम्मू, कश्मीर, गिलगिट और बाल्टिस्तान के अलावा लद्दाख भी शामिल था. इन सभी इलाकों को एक सूत्र में बांध कर एक राज्य बनाने का श्रेय डोगरा राजपूतों को जाता है. जम्मू के डोगरा शासकों ने 1830 के दशक में लद्दाख पर फतह हासिल की, 40 के दशक में उन्होंने अंग्रेजों से कश्मीर घाटी हासिल कर ली और सदी के अंत तक वे गिलगिट तक कब्जा कर चुके थे. इस तरह कश्मीर एक ऐसा विशाल राज्य बन गया था जिसकी सीमाएं अफगानिस्तान, चीन और तिब्बत को छूती थीं. वहीं चीन लद्दाख को तिब्बत का हिस्सा मानता है.

दोस्तों, सिंधु नदी लद्दाख से निकलकर ही पाकिस्तान के कराची तक बहती है. प्राचीनकाल में लद्दाख कई अहम व्यापारिक रास्तों का प्रमुख केंद्र था. इसके अलावा लद्दाख मध्य एशिया से कारोबार का एक बड़ा गढ़ था. सिल्क रूट की एक शाखा लद्दाख से होकर गुजरती थी. वहीं दूसरे मुल्कों से यहां सैकड़ों ऊंट, घोड़े, खच्चर, रेशम और कालीन लाए जाते थे जबकि हिंदुस्तान से रंग, मसाले आदि बेचे जाते थे. तिब्बत से भी याक पर ऊन, पश्मीना वगैरह लादकर लोग लेह तक आते थे. यहां से इसे कश्मीर लाकर बेहतरीन शॉलें बनाई जाती थीं.

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, करगिल की कुल जनसंख्या 140,802 है, जिनमें से 76.87% आबादी मुस्लिम है. इनमें ज्यादातर शिया है जबकि, लेह की कुल जनसंख्या 133,487 है. इसमें से 66.40% बौद्ध हैं. इस हिसाब से लद्दाख की कुल जन संख्या 2,74,289 लाख है. लद्दाख क्षेत्र की आबादी लेह और करगिल जिलों के बीच आधे हिस्से में विभाजित है. लद्दाख में कई स्थानों पर मिले शिलालेखों से पता चलता है कि यह स्थान नव-पाषाणकाल से स्थापित है. सिन्धु नदी लद्दाख की जीवन रेखा है. ज्यादातर ऐतिहासिक और वर्तमान स्थान जैसे कि लेह, शे, बासगो, तिंगमोसगंग सिन्धु किनारे ही बसे हैं. 1947 के भारत-पाक युद्ध के बाद सिन्धु का मात्र यही हिस्सा लद्दाख से बहता है. सिन्धु हिन्दू धर्म में एक पूजनीय नदी है, जो केवल लद्दाख में ही बहती है.

पूर्व में लेह के आसापास के निवासी मुख्यतः तिब्बती पूर्वजों और लद्दीखी भाषा वाले बौद्ध हैं, लेकिन पश्चिम में कारगिल के आसपास जनसंख्या मुख्यतः मुस्लिम है और इस्लाम की शिया शाखा की है. दोस्तों, साल 1979 में लद्दाख को कारगिल और लेह जिलों में बांटा गया था. लद्दाख मध्य एशिया से कारोबार का एक बड़ा गढ़ था. सिल्क रूट की एक शाखा लद्दाख क्षेत्र से होकर गुजरती थी. दूसरे मुल्कों के कारवें के साथ सैकड़ों ऊंट, घोड़े, खच्चर, रेशम और कालीन लाए जाते थे जबकि हिन्दुस्तान से रंग, मसाले आदि बेचे जाते थे. लद्दाख के अंतर्गत नोबरा, लेह, कारगिल और जंस्कार कुल 4 विधानसभा क्षेत्र आते थे.