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प्रधानमंत्री 15 अगस्त को लाल किले पर ही क्यों फहराते हैं तिरंगा?

भारतीय इतिहास में दो ऐसे प्रधानमंत्रियों के भी नाम हैं जिन्हें एक बार भी लालकिले पर झंडा फहराने का मौका नहीं मिला. इनमें से एक नेता तो दो बार प्रधानमंत्री बने हैं लेकिन इसके बावजूद भी वो अपने कार्यकाल में कभी भी 15 अगस्त पर लाल किले से झंडा नहीं फहरा पाए.

15 अगस्त के दिन हर साल ही जश्न का माहौल बना होता हैं और हो भी क्यों ना... इस दिन हमारे देश को अंग्रेजों से आजादी जो मिली थी. आजादी के बाद से ही स्वतंत्रता दिवस के मौके पर दिल्ली के लाल किला पर भारत के प्रधानमंत्री के जरिए तिरंगा फहराया जाता हैं. लाल किला हमारे देश की ऐतिहासिक इमारतों की सूची में शुमार है. लेकिन एक सवाल जो हर किसी के दिमाग में आता है और वो ये है कि आखिर लाल किले पर ही क्यों हर साल तिरंगा फहराया जाता हैं? क्या इसके पीछे कोई बड़ी वजह है? आइए जानते हैं इसके बारे में... लेकिन दोस्तों, अगर आपने अभी तक हमारे चैनल को सब्सक्राइब नहीं किया है तो नए अपडेट्स पाने के लिए जल्द से जल्द सब्सक्राइब कर लें...

दोस्तों, स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले पर ही तिरंगा क्यों फहराया जाता है, इसको जानने के लिए हमें शुरू से शुरुआत करनी होगी. दरअसल साल 1639 में मुगल बादशाह शाहजहां ने लाल किले का निर्माण करवाया था. पहले लाल किले का नाम 'किला-ए-मुबारक' था. लाल किले को भारत की सबसे खूबसूरत इमारतों की सूची में जगह मिली हैं. इसका डिजाइन उस्ताद अहमद लाहौरी ने तैयार किया था. खास बात तो ये है कि उस्ताद अहमद लाहौरी ने ही ताज महल का भी निर्माण किया था. लाल किले को यमुना नदी के किनारे बनाया गया है. ठीक उसी तरह जिस तरह आगरा का ताज महल यमुना के किनारे बना हुआ हैं. दरअसल मुगल बादशाहों को नदियों से बहुत प्यार था और इसलिए वो अपने सभी महल नदी के आसपास ही बनवाते थे. मुगलों ने लाल किले में करीब 200 साल गुजारे हैं.

दोस्तों लाल किले का रंग लाल हैं और इसलिए उसका नाम भी लाल किला पड़ गया, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब लाल किले का रंग सफेद हुआ करता था. शुरुआत में इसे चूने के पत्थरों से बनाया गया था लेकिन अंग्रेजो के शासनकाल में लाल किला अपनी चमक खोने लगा था और इसलिए इस पर लाल रंग पुतवा दिया था. जब भी दुनिया के सबसे महंगे हीरे की बात की जाती है तो सबसे पहले दिमाग में कोहिनूर का ही नाम आता है और ये बात जानकर आपको हैरानी होगी कि वो कोहिनूर हीरा लाल किले में स्थित शाहजहां के राज सिंहासन का हिस्सा था. लेकिन जब अंग्रेजों ने भारत में शासन किया तब उन्होंने इस हीरे पर भी अपना कब्जा कर लिया था और इसे अपने साथ ले गए थे.

लाल किले का निर्माण साल 1638 में शुरू हुआ था और इसे बनकर तैयार होने में पूरे 10 साल लगे थे. लाल किले पर आखिर तक रहने वाला मुगल बहादुर शाह द्वितीय था लेकिन अंग्रेजों के सामने वो टिक ना पाया और फिर अंग्रेजों ने बहादुर शाह द्वितीय को एक बंदी के रूप में रख लिया था. इसके बाद लाल किले पर अंग्रेजों ने ही अपना अधिकार जमा लिया था. 1857 में हुई क्रांति के दौरान अंग्रेजो ने अपना गुस्सा निकालने के लिए लाल किले के कई हिस्सों को तबाह कर दिया था और कोहिनूर हीरे को ब्रिटेन पंहुचा दिया था.

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दोस्तों, 1857 की क्रांति की शुरुआत मेरठ में हुई. इसके बाद ये क्रांति की आग दिल्ली तक पहुंच गई. मुगल साम्राज्य के अंतिम बादशाह बहादुर शाह द्वितीय को भारत का शासक घोषित कर दिया. इस कारण गुस्साए अंग्रेजों ने बहादुर शाह द्वितीय को गिरफ्तार कर लिया. इस दौरान चली लड़ाई में कई लोग जो आंदोलन कर रहे थे उनकी जानें चली गईं. बादशाह पर मुकदमा चला. दीवान-ए-खास में करीब 40 दिनों तक मुकदमा चलने के बाद उसे देश निकाला दे दिया. जनवरी 1857 में उसे रंगून भेज दिया गया. 1857 की क्रांति के बाद भारत में आजादी के लिए कई बड़े आंदोलन हुए. इस दौरान हजारों भारतीयों ने अपना बलिदान खुशी-खुशी दे दिया.

लालकिले में मुगलों ने करीब 200 सालों तक निवास किया. मुगल यहां से अपना राजपाठ चलाते थे. धीरे-धीरे लालकिले में कई सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होने लगे. इससे इसका महत्व समय के साथ बढ़ता ही चला गया. आजादी के समय दिल्ली की सबसे महत्वपूर्ण इमारतों में यह एक थी. जब भारत को अंग्रेजों से आजादी मिली थी तब 15 अगस्त 1947 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सबसे पहले लाल किले पर ही आजादी का ऐलान किया था. आजादी के बाद सबसे पहले नेहरू ने यहां तिरंगा फहराया और इसके बाद यह भारतीय इतिहास में आजादी का प्रतीक बन गया. इस कारण हर साल लालकिले पर भारत के प्रधानमंत्री तिरंगा झंडा फहराते हैं और देश को संबोधित करते हैं.

हालांकि दोस्तों, भारतीय इतिहास में दो ऐसे प्रधानमंत्रियों के भी नाम हैं जिन्हें एक बार भी लालकिले पर झंडा फहराने का मौका नहीं मिला. इनमें से एक नेता तो दो बार प्रधानमंत्री बने हैं लेकिन इसके बावजूद भी वो अपने कार्यकाल में कभी भी 15 अगस्त पर लाल किले से झंडा नहीं फहरा पाए. दोस्तों, हर प्रधानमंत्री को अपनी जिंदगी में स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से झंडा फहराने का मौका मिल ही जाता है लेकिन गुलजारी लाल नंदा और चंद्रशेखर भारत के ऐसे प्रधानमंत्री के तौर पर देखे जाते हैं, जिनको प्रधानमंत्री रहते हुए भी अपने कार्यकाल में झंडा फहराने का मौका नहीं मिला. गुलजारी लाल नंदा दो बार भारत के प्रधानमंत्री रहे हैं. हालांकि गुलजारी लाल नंदा ने दोनों ही बार भारत के कार्यवाहक प्रधानमंत्री के तौर पर अपनी सेवाएं दी हैं. पहले बार 13 दिनों के लिए वो 27 मई 1964 से 9 जून 1964 तक कार्यकारी पीएम रहे और दूसरी बार भी 13 दिनों के लिए 11 जनवरी 1966 से 24 जनवरी 1966 तक उन्होंने कार्यवाहक पीएम का पद संभाला लेकिन उन्हें लाल किए से तिरंगा फहराने का मौका नहीं मिला. वहीं चंद्रशेखर दूसरे ऐसे प्रधानमंत्री रहे हैं जिन्‍हें एक बार भी लाल किले की प्राचीर से झंडा फहराने का मौका नहीं मिला. वह 10 नवंबर 1990 से 21 जून 1991 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे. ऐसे में चंद्रशेखर को भी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से तिरंगा झंडा फहराने का मौका नहीं मिला.