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देवघर में जेल के कैदी भगवान शिव को नाग मुकुट बनाकर क्यों भेजते हैं?

आस्था और रिवाजों का यह अनोखा नजारा देवघर की जिला जेल में देखने को मिलता है. परंपरा के मुताबिक, देवघर जेल के कैदी भगवान शिव के लिए फूलों से विशेष नाग मुकुट का निर्माण करते हैं.

झारखंड में स्थित देवघर देवालय के लिए खास माना जाता है. बैद्यनाथ धाम, बाबा धाम और कई अन्य नामों से जाना जाने वाला झारखंड जिले का शहर देवघर पवित्र हिंदू तीर्थो में से एक है. इसे देवगढ़ भी कहा जाता है. झारखंड का वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग हिंदू धर्म का बेहद पवित्र स्थल है. जहां पर यह मंदिर स्थित है उस स्थान को 'देवघर' यानी देवताओं का घर कहते हैं. यह ज्‍योतिर्लिंग एक सिद्धपीठ है. कहा जाता है कि यहां पर आने वाले भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. इस कारण इस लिंग को 'कामना लिंग' भी कहा जाता हैं. आप देवघर आएंगे तो बैद्यनाथ यात्रा से ही जान जाएंगे कि भारतीय हिंदू के लिए आध्यात्मिकता क्या अर्थ रखती है. यहां तीर्थयात्रियों का तांता लगा रहता है. यह शहर हिंदुओं का प्रसिद्ध तीर्थ-स्थल है. यहां भगवान शिव का एक अत्यंत प्राचीन मंदिर मौजूद है. झारखंड के देवघर में लगने वाला सावन मेला दुनिया भर में प्रसिद्ध है. खास कर के भोले बाबा के श्रद्धालुओं में तो इस मेले का अलग ही उत्साह देखने को मिलता है. वैद्यनाथ धाम में लगने वाला यह मेला देश के सबसे बड़े मेलों में गिना जाता है. दोस्तों, आइए जानते हैं देवघर के बारे में कुछ खास बातें...

हर साल सावन के पवित्र महीने में यहां लाखों शिव भक्तों की भीड़ उमड़ती है जो देश के विभिन्न हिस्सों समेत विदेशों से भी यहां आते हैं. इन भक्तों को कावरियां कहा जाता है. ये शिव भक्त बिहार में सुल्तानगंज से गंगा नदी से गंगाजल लेकर 105 किलोमीटर की दूरी पैदल तय कर देवघर में भगवान शिव को जल अर्पित करते हैं. यहां बाबा बैद्यनाथ का ऐतिहासिक मंदिर है जो भारत के बारह ज्योतिर्लिगों में से एक है. देवघर सती के 52 शक्तिपीठों में से भी एक है. पुराणों में देवघर को हृदय पीठ और चिता भूमि भी कहा गया है क्योंकि इसी स्थान पर माता पार्वती का हृदय गिरा था और और यहीं भगवन शिव ने उनका अंतिम संस्कार किया था.

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में शुमार झारखंड के वैद्यनाथ मंदिर में सावन की शुरुआत के साथ ही हजारों कांवड़ यात्री देवघर पहुंचने लगे हैं. परंपराओं के मुताबिक देश भर से कांवड़ यात्री सावन के पवित्र महीने में यहां आकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं. लेकिन जलाभिषेक के साथ एक और परंपरा भी है, जिसका निर्वहन मंदिर में ब्रिटिश काल से ही किया जाता है. देवघर के वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग में भगवान शिव को वर्षों से सायंकालीन श्रृंगार के वक्त एक विशेष मुकुट पहनाया जाता है. खास बात यह कि इस मुकुट का निर्माण वे लोग करते हैं जो संगीन अपराधों के दोषी बनकर यहां की जेल में बंद होते हैं. 

आस्था और रिवाजों का यह अनोखा नजारा देवघर की जिला जेल में देखने को मिलता है. परंपरा के मुताबिक, देवघर जेल के कैदी भगवान शिव के लिए फूलों से विशेष नाग मुकुट का निर्माण करते हैं. ब्रिटिश कालीन भारत के वक्त से ही हर रोज जेल के कैदियों की ओर से बनाया गया ये मुकुट मंदिर में श्रृंगार के लिए लाया जाता है और इसके लिए जेल से सिपाहियों को पैदल मंदिर तक मुकुट के साथ भेजा जाता है. सावन महीने की पूर्णिमा के दिन जेल के कैदी ऐसे दो मुकुटों का निर्माण करते हैं, जिसमें से एक दुमका के बासुकीनाथ धाम और दूसरा वैद्यनाथ मंदिर में भेजा जाता है. 

वहीं नाग मुकुट की परंपरा की शुरुआत 1911 से मानी जाती है. जेल के कैदी और सिपाही साल 1911 से ही मंदिर में अगाध आस्था रख रहे हैं. ब्रिटिश काल में बंगाल प्रेसिडेंसी के कमिश्नर जे डब्ल्यू टेलर के वक्त से ही नाग मुकुट बनाने की शुरुआत की गई थी. उस साल कमिश्नर टेलर के बेटे की तबीयत बहुत खराब हो गई थी. जब देश भर के डॉक्टरों ने बच्चे के इलाज से इनकार कर दिया तो एक साधु ने टेलर को वैद्यनाथ मंदिर में दर्शन करने की सलाह दी. दर्शन के बाद टेलर के बेटे की तबीयत ठीक हो गई और इस एक घटना ने ना सिर्फ भारतीय बल्कि विदेशी श्रद्धालुओं को भी यहां की आस्था से जोड़ दिया. 

दोस्तों, देवघर में कई मंदिर भी काफी फेमस है. इनके बारे में भी जान लेते हैं. लेकिन दोस्तों, उससे पहले अगर किसी स्पेशल टॉपिक पर कोई वीडियो देखना चाहते हैं तो कमेंट बॉक्स में टॉपिक का नाम कमेंट कर जरूर बताएं.

बैद्यनाथ मंदिर
बैद्यनाथ मंदिर में स्थापित लिंग भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिगों में से एक है. भगवान श्री बैद्यनाथ ज्योतिर्लिग का मंदिर जिस स्थान पर अवस्थित है उसे बैद्यनाथ धाम कहा जाता है. यह ज्योर्तिलिंग लंकापति रावण के जरिए लाया गया था. बैधनाथ को आत्मलिंग, महेश्वर्लिंग, कमानालिंग, रावणेश्वर महादेव, श्री वैधनाथलिंग, नर्ग तत्पुरुष और बेंगुनाथ के आठ नामों से जाना जाता है. बैद्यनाथ धाम में यूं तो सालों भर लोग ज्योर्तिलिंग के दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन सावन और अश्विन मास में यहां श्रद्धालुओं की अपार भीड़ पहुंचती है. बैद्यनाथ का मुख्य मंदिर सबसे पुराना है जिसके आसपास अनेक अन्य मंदिर भी हैं

बासुकीनाथ मंदिर
बासुकीनाथ अपने शिव मंदिर के लिए जाना जाता है. बैद्यनाथ मंदिर की यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक बासुकीनाथ में दर्शन नहीं किए जाते हैं. यह मंदिर देवघर से 45.20 किलोमीटर दूर स्थित हिन्दुओं का यह तीर्थ स्थल दुमका जिले में स्थित है.

त्रिकुट पहाड़ियां
देवघर से 16 किलोमीटर दूर दुमका रोड पर एक खूबसूरत पर्वत त्रिकूट स्थित है. इस पहाड़ पर बहुत सारी गुफाएं और झरनें हैं. यह स्थल मयूराक्षी नदी के स्त्रोत के लिए प्रसिद्ध है.

बैजू मंदिर
बाबा बैद्यनाथ मंदिर परिसर के पश्चिम में देवघर के मुख्य बाजार में तीन और मंदिर भी हैं. इन्हें बैजू मंदिर के नाम से जाना जाता है.

नंदन पहाड़
शांत और प्राकृतिक वातावरण एक खूबसूरत मंदिर की उपस्थिति के कारण और भी जीवंत हो उठता है. नंदन पहाड़ देवघर के छोर पर स्थित है. इस पर्वत की महत्ता यहां बने मंदिरों के झुंड के कारण है. जो कई भगवानों को समर्पित हैं. यहां बच्चों के बड़ा पार्क भी है.

नौलखा मंदिर
देवघर के बाहरी हिस्से में स्थित यह मंदिर अपने वास्तुशिल्प की खूबसूरती के लिए जाना जाता है. इस मंदिर का निर्माण बालानंद ब्रह्मचारी के एक अनुयायी ने किया था.

सत्संग आश्रम
देवघर के दक्षिण पश्चिम में स्थित सत्संग आश्रम झारखंड के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है. इसकी स्थापना ठाकुर अनुकूलचंद्र द्वारा की गई थी. यह बहुत ही सौम्य और शांत वातावरण में स्थित है. सर्व धर्म मंदिर के अलावा यहां पर एक संग्रहालय और चिड़ियाघर भी है.

तपोवन
देवघर से 10 किमी दूरी पर स्थित तपोवन अपने प्रसिद्ध शिवमंदिर के लिए जाना जाता है. गुफाओं और पहाड़ी पर बने मंदिरों के लिए जाना जाने वाला तपोवन एक रमणीय स्थान है. मान्यता है कि यह ऋषि बाल्मीकी तपस्या करने आए थे. कहते हैं कि श्री बालानंद बह्माचारी ने यहां पर तप करके दिव्यता प्राप्त की.