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बिहार के रवीश कुमार ने नरेंद्र मोदी की बोलती की बंद! मिला रेमन मैग्सेसे अवार्ड

एक तथ्य यह भी है कि नरेंद्र मोदी सरकार की एनडीटीवी से हमेशा ठनी रही है. एनडीटीवी और मोदी सरकार के बीच 36 का आंकड़ा माना जाता है.

अपनी बेबाक पत्रकारिता के लिए पहचान बनाने वाले पत्रकार रवीश कुमार के नाम अब एक और उपलब्धि हाथ लगी है. भारत के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार को साल 2019 के रेमन मैग्सेसे पुरस्कार के लिए चुना गया है. इस पुरस्कार को नोबेल पुरस्कार का एशियाई संस्करण माना जाता है. यह सम्मान एशिया में साहसिक और परिवर्तनकारी नेतृत्व के लिए दिया जाता है. रवीश कुमार को भारतीय मीडिया में सरकार के खिलाफ पत्रकारिता करने के लिए जाना जाता है. जिसके कारण वो कई लोगों के निशाने पर भी रहते हैं. हालांकि रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिलने के बाद उनके विरोधियों के मुंह पर अब ताला जड़ चुका है. दोस्तों, रवीश कुमार की जिंदगी भी काफी प्रेरक रही है. उनकी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा उन्हें पत्रकारिता करने में लगाया है और ये सिलसिला अब भी जारी है. हालांकि बहुत से लोग रवीश कुमार के बारे में नहीं जानते हैं, तो दोस्तों, आइए आज हम आपको रवीश कुमार के इतिहास के बारे में बताते हैं लेकिन दोस्तों, उससे पहले अगर आपने अभी तक हमारे चैनल को सब्सक्राइब नहीं किया है तो नए अपडेट्स पाने के लिए जल्द से जल्द सब्सक्राइब कर लें.... तो आइए शुरू करते हैं.

दोस्तों, रवीश कुमार को NDTV के कारण पहचान मिली और आज एनडीटीवी को लोग रवीश कुमार के कारण ज्यादा जानते है. रवीश कुमार ने साल 1996 से एनडीटीवी में पत्रकारिता की शुरुआत की थी और तभी से वो एनडीटीवी से ही जुड़े हुए हैं. आज रवीश कुमार एनडीटीवी इंडिया के मैनेजिंग एडिटर हैं. उनकी पत्रकारिता वास्तव में लोगों को सोचने पर मजबूर कर देती है. रेमन मैग्सेस अवॉर्ड फाउंडेशन ने रवीश कुमार की पत्रकारिता को उच्चस्तरीय, सत्य के प्रति निष्ठा, ईमानदार और निष्पक्ष बताया है. फाउंडेशन ने कहा है कि रवीश कुमार ने बेजुबानों को आवाज दी है. अवॉर्ड देने वाले संस्थान ने कहा है कि रवीश कुमार अपनी पत्रकारिता के जरिए उनकी आवाज को मुख्यधारा में ले आए, जिनकी हमेशा उपेक्षा की जाती है. रेमन मैग्सेसे संस्थान की ओर से कहा गया है कि अगर आप लोगों की आवाज बनते हैं तो आप पत्रकार हैं.


रवीश कुमार हिन्दी समाचार चैनल एनडीटीवी इंडिया के सबसे लोकप्रिय चेहरा हैं. 44 साल की उम्र में उन्हें ये पुरस्कार मिला है. रवीश कुमार का जन्म बिहार में हुआ है. उन्होंने शुरुआती पढ़ाई बिहार में की. इसके बाद वो दिल्ली आ गए और दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया. शुरू से ही उनमें पत्रकारिता करने का जज्बा था. पत्रकारिता में रवीश कुमार ने बहुत लंबा सफर तय किया है और उन्होंने शुरुआत बिल्कुल नीचे से या कहें कि शून्य से की है. साल 1996 का वो वक्त था जब रवीश कुमार हिंदी समाचार चैनल एनडीटीवी से जुड़े थे. अपने शुरुआत दिनों में रवीश कुमार एनडीटीवी में आई चिट्ठियां छांटने का काम किया करते थे. या यूं कहें कि रवीश कुमार चिट्ठियों को फिल्टर किया करते थे. जो काम की चिट्ठी होती उन्हें आगे बढ़ा दिया करते थे. दोस्तों, ये तो बस रवीश कुमार की शुरुआत थी और उन्होंने इसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. धीरे-धीरे वो रिपोर्टिंग की ओर मुड़ गए. उन्होंने एक के बाद एक शानदार रिपोर्टिंग की और वो लोगों की आवाज बनते गए.

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दोस्तों, रवीश कुमार की सजग आंख देश और समाज की विडंबनाओं को अचूक ढंग से पहचानती रहीं. उनका कार्यक्रम 'रवीश की रिपोर्ट' बेहद चर्चित हुआ और हिंदुस्तान के आम लोगों का कार्यक्रम बन गया. अपने कार्यक्रम में वो मौजूदा हालातों को उठाने का काम करते. वो हमेश ऐसा विषय को चुनते हैं जिन्हें बाकी लोग नजरअंदाज कर देते हैं और इसी के चलते वो ऐसे लोगों की आवाज बन जाते हैं, जिनको दबा दिया जाता है या चुप करा दिया जाता है.

रिपोर्टिंग करने के बाद एंकरिंग करते हुए उन्होंने टीवी पत्रकारिता की जैसे एक नई परिभाषा रची. इस देश में जिसे भी लगता है कि उसकी आवाज कोई नहीं सुनता है उसे रवीश कुमार से उम्मीद होती है. टीवी एंकरिंग के दौरान उन्होंने लगातार ऐसे मुद्दों को उठाया, जिन पर सरकार और प्रशासन भी ध्यान नहीं देता है. रवीश को वर्तमान में सरकार के खिलाफ एंकरिंग करने के लिए जाना जाता है. रवीश कुमार सरकार की जमीनी हकीकत जनता के सामने रखने के लिए जाने जाते हैं. टीवी पत्रकारिता के इस शोर-शराबे भरे दौर में उन्होंने सरोकार वाली पत्रकारिता का परचम लहराए रखा है.सत्ता के खिलाफ वो बेखौफ पत्रकारिता करते रहे हैं.

लेकिन अब मिले रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से उनकी पत्रकारिता को एक और बड़ी मान्यता मिली है. रवीश कुमार ने अपने प्राइम टाइम में जनसरोकार के मुद्दों पर जोर दिया. उनकी नौकरी और विश्वविद्यालय कॉलेजों को लेकर चलाई गई सीरीज को भी खूब पंसद किया गया है. इससे पहले भी रवीश कुमार को कई पुरस्कार हासिल हो चुके हैं. साल 2010 में रवीश कुमार को गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके अलावा 2013 और 2017 में प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका अवॉर्ड भी रवीश कुमार को मिल चुका है. 2016 में सर्वश्रेष्ठ पत्रकार का रेड इंक अवॉर्ड भी रवीश कुमार को मिला. 2017 में पहला कुलदीप नैयर पत्रकारिता अवॉर्ड भी रवीश को मिला है और अब 2019 में बेहतरीन पत्रकारिता के लिए रमन मैग्सेसे अवार्ड मिला. यही नहीं, रवीश कुमार ने कई किताबें भी लिखी हैं. इश्क में शहर होना, देखते रहिए, रवीशपन्ती और द फ्री वॉइस: ऑन डेमोक्रेसी, कल्चर एंड द नेशन नाम से उनकी चार किताबें हैं.

दोस्तों, एक तथ्य यह भी है कि नरेंद्र मोदी सरकार की एनडीटीवी से हमेशा ठनी रही है. एनडीटीवी और मोदी सरकार के बीच 36 का आंकड़ा माना जाता है. 2014 के बाद नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही जिस तरह से एक के बाद एक मीडिया घरानों ने आत्मसमर्पण किया, सरकार के चरणों में गिर गये और सुबह से शाम तक स्तुति गान में मगन हो गये तब भी एनडीटीवी ने हार नहीं मानी और सरकार की चमचागिरी करने को तैयार नहीं हुआ. मोदी सरकार का कहर भी नाजिर हुआ. एनडीटीवी के मालिकों के ठिकानों पर छापे भी पड़े. ऊल-जुलूल आरोप भी लगाये गये. सरकारी एजेंसियों ने ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की, मानो एनडीटीवी कोई अपराधी हो और वहां काम करने वाले हर कोई घोटालेबाज हो. आयकर विभाग और दूसरी जांच एजेंसियां नोटिस पर नोटिस भेजती रहीं और संस्थान को तंग किया गया. इन सबके बावजूद रवीश कुमार के पैर नहीं डगमगाए और उनकी बेबाक पत्रकारिता आज भी जारी है.