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'बाहुबली' चंद्रयान-2 को कंधे पर उठाकर चांद पर पहुंचाएगा?...

इस मिशन के लिए रॉकेट को 15 जुलाई को उड़ान भरनी थी. मगर तकनीकी खराबी के कारण रॉकेट प्रक्षेपण से लगभग एक घंटा पहले इसे स्थगित कर दिया गया.

भारत के दूसरे चंद्रमा अभियान चंद्रयान-2 को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दियया गया है. 375 करोड़ रुपये के जियोसिंक्रोनाइज सैटेलाइट लांच व्हीकल मार्क-3 यानी जीएसएलवी एम-3 रॉकेट ने 3.8 टन वजनी और 603 करोड़ रुपये की कीमत के चंद्रयान-2 को लेकर अंतरिक्ष के लिए चढ़ाई शुरू की. कुल 43.4 मीटर लंबे और 640 टन वजनी जीएसएलवी एम-3 का उपनाम कामयाब रही फिल्म 'बाहुबली' के सुपर हीरो के नाम पर रखा गया है. यह रॉकेट भारत के दूसरे मिशन को अंजाम देने के लिए 3.8 टन वजनी चंद्रयान-2 को अपने साथ ले गया. लेकिन क्या आप जानते हैं कि चंद्रयान-2 से भारत को क्या फायदा होगा? आइए जान लेते हैं लेकिन दोस्तों उससे पहले अगर आपने हमारे चैनल को सब्सक्राइब नहीं किया है तो नए अपडेट्स पाने के लिए जल्द से जल्द सब्सक्राइब कर लें. आइए शुरू करते हैं.

वैसे, इस मिशन के लिए रॉकेट को 15 जुलाई को उड़ान भरनी थी. मगर तकनीकी खराबी के कारण रॉकेट प्रक्षेपण से लगभग एक घंटा पहले इसे स्थगित कर दिया गया. तकनीकी खामी पता लगाने के लिए इसरो की काफी तारीफ भी की जा रही है. इसके बाद इसरो ने तकनीकी खराबी को ठीक करने के बाद 22 जुलाई को प्रक्षेपण का दिन तय किया. चंद्रयान-2 पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की लगभग 3,84,400 किलोमीटर की यात्रा तय करेगा. लांच के बाद, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के अध्यक्ष के. सिवन ने कहा, "मुझे यह घोषणा करते हुए बेहद खुशी हो रही है कि जीएसएलवी मार्क-3 ने चंद्रयान-2 अंतरिक्ष यान को सफलतापूर्वक पृथ्वी की कक्षा में दाखिल कर दिया है. यह भारत के लिए एक ऐतिहासिक यात्रा की शुरुआत है. मैं चंद्रयान-2 के प्रक्षेपण में शामिल सभी लोगों को सलाम करता हूं."

इसरो के रॉकेट जियोसिंक्रोनाइज सैटेलाइट लांच व्हीकल मार्क-3 ने श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से चंद्रमा के लिए 22 जुलाई की दोपहर बाद ठीक 2:43 बजे उड़ान भरी. चंद्रयान-2 में कुल तीन खंड हैं. इसमें ऑर्बिटर 2379 किलोग्राम-आठ पेलोड, लैंडर 'विक्रम' 1471 किलोग्राम-चार पेलोड और रोवर 'प्रज्ञान' 27 किलोग्राम- दो पेलोड शामिल हैं.

दोस्तों, चंद्रयान-2 को अपने कंधे पर उठाकर चांद की ओर रवाना करने की जिम्मेदारी इसरो ने अपने ‘बाहुबली’ को दी है. ‘बाहुबली’ इसरो का सबसे शक्तिशाली रॉकेट है. इसका वास्तविक नाम जिर्योंसक्रोनस सेटेलाइट लांच व्हीकल-मार्क 3 यानी जीएसएलवी-एमके 3 है. यह रॉकेट, चार टन वजनी सेटेलाइट ले जाने में सक्षम है. रॉकेट का अपना वजन 640 टन और ऊंचाई 43.4 मीटर है. आइये जानते हैं मिशन से जुड़े अन्य तकनीकी पहलुओं और उनकी भूमिका के बारे में

ऑर्बिटर
2379 किलोग्राम वजन वाला ऑर्बिटर एक साल तक चांद की परिक्रमा करेगा. इसमें आठ पेलोड लगे हैं. जो अलग-अलग प्रयोगों को अंजाम देंगे. यह ऑर्बिटर बेंगलुरु स्थित इंडियन डीप स्पेस नेटवर्क से संपर्क साधने में सक्षम होगा. इसके अलावा यह लैंडर के संपर्क में भी रहेगा.

लैंडर विक्रम
1471 किलोग्राम वजनी लैंडर का नाम भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान के जनक कहे जाने वाले विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया है. इस पर तीन पेलोड लगे हैं. यह दो मीटर प्रति सेकंड की गति से चांद की सतह पर उतरेगा. इसे चांद की एक दिन की अवधि तक काम करने के लिए तैयार किया गया है. धरती के हिसाब से यह अवधि 14 दिन की बनेगी. यह लैंडर बेंगलुरु में आइडीएसएन के साथ-साथ ऑर्बिटर और रोवर से संपर्क स्थापित कर सकेगा.

रोवर प्रज्ञान
रोवर प्रज्ञान का नाम संस्कृत से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है ज्ञान. 27 किलोग्राम वजन वाले इस रोवर पर दो पेलोड लगे हैं. यह छह पहियों वाला एक रोबोटिक वाहन है. सौर ऊर्जा की मदद से यह एक सेंटीमीटर प्रति सेकंड की गति से चल सकेगा. इसे भी चांद के एक दिन यानी धरती के 14 दिन के बराबर काम करने के लिए बनाया गया है. इस पूरी अवधि में यह चांद की सतह पर कुल 500 मीटर की दूरी तय करेगा.

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दोस्तों, दिलचस्प बात यह है कि चंद्रयान-2 चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा. अभी तक चांद के जितने भी मिशन रहे हैं वे दक्षिणी ध्रुव पर नहीं उतरे हैं. चांद के इस हिस्से के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है. इतना ही नहीं चांद पर पहुंच चुके अमेरिका, रूस और चीन ने भी अभी तक इस जगह पर कदम नहीं रखा है. भारत के चंद्रयान-1 मिशन के दौरान ही दक्षिणी ध्रुव पर पानी के बारे में पता चला था.

इसके बाद से ही पूरी दुनिया में चांद के साउथ पोल यानी दक्षिणी ध्रुव के बारे में रूचि जगी थी. चंद्रयान-2 के जरिए भारत दक्षिणी ध्रुव पर मौजूद उन सभी संभावनाओं की खोज कर सकता है जिससे करीब 500 साल तक देश की ऊर्जा की जरूरतें पूरी की जा सकती हैं. चांद का दक्षिणी ध्रुव कई मायनों में दिलचस्प है. इस पोल का बड़ा हिस्सा नॉर्थ पोल की तुलना में अधिक छाया में रहता है. इस बात की पूरी संभावना है कि इसी हिस्से में पानी हो सकता है. चंद्रयान-2 का रोवर प्रज्ञान वहां पता लगाएगा कि कितने भाग में पानी है.

दोस्तों, इसरो के एक अधिकारी के मुताबिक लैंडर विक्रम सात सितंबर को चंद्रमा की सतह पर उतरेगा. चंद्रमा पर उतरने के लिए यह इसरो का पहला मिशन है. इसरो के मुताबित लैंडिंग के दिन सात सितंबर को लैंडर विक्रम ऑर्बिटर से अलग हो जाएगा. विक्रम से अपेक्षा की जा रही है कि वह दक्षिणी ध्रुव के पास चंद्रमा की सतह से 100 किमी की ऊंचाई से नरम भूमि पर पहुंच जाएगा. इससे पहले कोई भी यहां नहीं पहुंच पाया है. यहां पर कुल तीन वैज्ञानिक प्रयोग किए जाने हैं. इसके बाद छह पहियों वाला रोवर प्रज्ञान चांद की सतह पर दो प्रयोग करेगा. यह प्रयोग चांद की एक दिन की अवधि के लिए होगा, जो 14 पृथ्वी दिनों के बराबर होती है. इसके अलावा आठ वैज्ञानिक प्रयोगों के साथ ऑर्बिटर एक वर्ष की अवधि के लिए अपने मिशन को जारी रखेगा. इस मिशन में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का एक निष्क्रिय प्रयोग भी शामिल है. भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा कि ये मिशन चंद्रमा की उत्पत्ति को उजागर करने का भी प्रयास करेगा.