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चंद्रयान-2 का सच! क्या चांद पर वाकई पानी है?

चंद्रयान-1 चंद्रमा पर जाने वाला भारत का पहला मिशन था. यह मिशन लगभग एक साल अक्तूबर 2008 से सितंबर 2009 तक था.

भारत के दूसरे चंद्रमा अभियान चंद्रयान-2 को बाहुबली रॉकेट यानी जीएसएलवी-मार्क-3 के साथ सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया. यह चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र का अध्ययन करेगा जोकि अभी तक दुनिया के किसी भी अंतरिक्ष मिशन में नहीं किया गया है. ऐसे में यह मिशन सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के लिए भी आश्चर्य बना हुआ है. इस बार चंद्रयान-2 का फोकस चांद पर पानी की खोज पर होगा. अगर चांद पर पानी मिलता है तो इंसानों के लिए यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि साबित होगी... लेकिन दोस्तों क्या सच में चांद पर पानी है? आइए जानते हैं इसके बारे में... लेकिन दोस्तों, उससे पहले अगर आपने अभी तक हमारे चैनल को सब्सक्राइब नहीं किया है तो जल्द से जल्द सब्सक्राइब कर लें. तो आइए शुरू करते हैं.

375 करोड़ रुपये के जियोसिंक्रोनाइज सैटेलाइट लांच व्हीकल मार्क-3 रॉकेट ने 3.8 टन वजनी और 603 करोड़ रुपये की कीमत के चंद्रयान-2 को लेकर अंतरिक्ष के लिए उड़ान भरी. कुल 43.4 मीटर लंबे और 640 टन वजनी जीएसएलवी एम-3 का उपनाम कामयाब रही बाहुबली फिल्म के सुपर हीरो के नाम पर रखा गया है. यह रॉकेट भारत के दूसरे मिशन को अंजाम देने के लिए 3.8 टन वजनी चंद्रयान-2 को अपने साथ लेकर गया. चंद्रयान-2 पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की लगभग 384,400 किमी की यात्रा तय करेगा.

चंद्रयान-2 के सफलतापूर्वक लांच होने के बाद भारत अंतरिक्ष में एक बड़ी शक्ति के तौर पर स्थापित हो गया है. इस मिशन के दो महत्वपूर्ण मकसद चांद पर पानी की खोज और वहां इंसानों के रहने की कितनी उम्मीदें हैं इनका का पता लगाना है. दोस्तों, इस मिशन के लिए रॉकेट को पहले 15 जुलाई को उड़ान भरनी थी. मगर तकनीकी खराबी के कारण रॉकेट प्रक्षेपण से लगभग एक घंटा पहले इसे स्थगित कर दिया गया. तकनीकी खामी पता लगाने के लिए इसरो की काफी तारीफ भी की जा रही है. इसके बाद इसरो ने तकनीकी खराबी को ठीक करने के बाद 22 जुलाई को प्रक्षेपण का दिन तय किया और उस दिन प्रक्षेपण सफल भी रहा.

चंद्रयान-2 के सफलतापूर्वक लांच होने के बाद भारत अंतरिक्ष में एक बड़ी शक्ति के तौर पर स्थापित हो गया है. इस मिशन के दो महत्वपूर्ण मकसद है. पहला चांद पर पानी की खोज और दूसरा वहां इंसानों के रहने की कितनी उम्मीदें हैं. इनका पता लगाना है. वहीं चंद्रमा का दक्षिणी धुव्र एक ऐसा क्षेत्र है जहां अभी कोई देश नहीं पहुंच सका है. यहां कुछ नया मिलने की संभावना है. वैज्ञानिकों का अंदाजा है कि हमेशा छाया में रहने वाले इन क्षेत्रों में पानी और खनिज होने की संभावना हो सकती है. हाल में किए गए कुछ ऑर्बिट मिशन में भी इसकी पुष्टि हुई है. लेकिन अभी भी सवाल ये बना हुआ है कि क्या चांद पर वाकई पानी है या नहीं. लेकिन दोस्तों, अगर चांद पर पानी मिलता है तो यह वाकई सबसे बड़ी खोज होगी. पानी की मौजूदगी चांद के दक्षिणी धुव्र पर भविष्य में इंसान की उपस्थिति के लिए फायदेमंद हो सकती है. यहां की सतह की जांच ग्रह के निर्माण को और गहराई से समझने में भी मदद कर सकती है. भविष्य के मिशनों के लिए संसाधन के रूप में इसके इस्तेमाल की क्षमता का पता चल सकता है.

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दोस्तों, चंद्रयान-1 चंद्रमा पर जाने वाला भारत का पहला मिशन था. यह मिशन लगभग एक साल अक्तूबर 2008 से सितंबर 2009 तक था. चंद्रयान-1 को चंद्रमा के कक्ष में जाकर कुछ मशीनरी स्थापित करनी थी. साथ ही इसे भारत का झंडा लगाना था और आंकड़े भेजने थे और चंद्रयान ने इसमें से सारे काम लगभग पूरे किए थे. चंद्रयान-1 में सिर्फ ऑर्बिटर था, जो चंद्रमा की कक्षा में घूमता था, लेकिन चंद्रयान-2 से भारत पहली बार चांद की सतह पर लैंडर उतारेगा. चंद्रयान-1 जब 2008 में लांच किया गया था तो उसने इस बात की पुष्टि की थी कि चांद पर पानी है. वहीं दोस्तों, चंद्रयान-2 के बाद इसरो की मंशा है कि वह जल्द 2022 तक ‘गगनयान’ से एक भारतीय को भारत की जमीन से और भारत के रॉकेट से अंतरिक्ष में भेजे.

दोस्तों, भारत के चंद्रयान-2 के बाद कई देश हैरान हैं. इन देशों में भारत के कई पड़ोसी देश भी शामिल हैं. भारत के साथ कई मामलों में विरोध जताने वाला चीन भी चंद्रयान-2 की चमक से चकित है. उसने पहली बार अंतरिक्ष मिशन के लिए भारत से मदद की अपील की है. चीन चाहता है कि वह भारत के साथ मिलकर चांद पर खोजी अभियान भेजे. चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ चुनिंग ने इसरो को बधाई देते हुए कहा कि भारत के चंद्रयान-2 मिशन से हमें भी काफी उम्मीदें हैं. चीन इसे बेहद सकारात्मक तरीके से देखता है. चीन चाहता है कि भविष्य में चीन और भारत साथ मिलकर अंतरिक्ष से संबंधी अभियानों को अंजाम दे. हुआ चुनिंग ने कहा कि मानवता की भलाई के लिए चीन ऐसे कई अंतरिक्ष अभियान करता आया है. भारत भी ऐसे ही प्रोजेक्ट्स में कई सालों से लगा हुआ है. क्योंकि अंतरिक्ष में प्रयोग के तौर पर भेजी गई तकनीक का सफल उपयोग बाद में उन सैटेलाइट्स में किया जाता है जो संचार, मौसम, आपदा संबंधी होते हैं. इसलिए हम चाहते हैं कि चांद पर मिशन के लिए भारत और चीन एकसाथ काम करें.

चीन की अंतरिक्ष एजेंसी चाइना नेशनल स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन के चीफ झांग केजियान ने कुछ हफ्तों पहले कहा था कि चीन अगले 10 साल में यानी 2029-30 तक चांद के दक्षिणी ध्रुव पर मानव मिशन भेजने की योजना बना रहा है. जबकि, भारत चांद के दक्षिणी ध्रुव पर मून मिशन भेजने वाला पहला देश बनने के करीब है. ऐसे में जब चांद के दक्षिणी ध्रुव से चंद्रयान-2 जानकारियां देगा तो वह चीन के काफी काम आएगा. चांद की सतह पर अब तक अमेरिका, रूस और चीन ही सॉफ्ट लैंडिंग करा पाए हैं. 6 सितंबर को भारत ऐसा करने वाला चौथा देश बन जाएगा. चीन को इस बात का पूरा भरोसा है कि इसरो का यह मिशन पूरी तरह से सफल होगा. इसलिए वह अगले मून मिशन में भारत का सहयोग चाहता है.

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